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कपसाड़ का संग्राम: एक मां का बलिदान और 58 घंटे का पुलिस रेस्क्यू

आज कपसाड़ गांव में शांति तो है, लेकिन सन्नाटा भारी है। सुनीता के घर में मातम है, प्रशासन ने पीड़ित परिवार को 22 लाख रुपये की आर्थिक मदद और सुरक्षा का भरोसा दिया है। रूबी अब कोर्ट के सामने अपने बयान दर्ज कराएगी, जो यह तय करेंगे कि पारस का भविष्य जेल की सलाखों के पीछे कितना लंबा होगा।

अध्याय 1: वह खूनी सुबह

कहानी शुरू होती है 8 जनवरी 2026 की सुबह। मेरठ के सरधना का कपसाड़ गांव अभी कोहरे की चादर से पूरी तरह जागा भी नहीं था। 50 साल की सुनीता अपनी 21 साल की बेटी रूबी के साथ खेत में गन्ना छीलने निकली थीं। उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि गन्नों की आड़ में मौत छिपी है। गांव का ही दबंग युवक पारस सोम अपने साथियों के साथ घात लगाए बैठा था।

जैसे ही मां-बेटी रजवाहे (नहर) के पास पहुंचीं, पारस ने रूबी को खींचकर अगवा करने की कोशिश की। एक मां अपनी संतान को बचाने के लिए शेरनी की तरह भिड़ गई। इस हाथापाई के बीच, पारस ने अपना आपा खोया और हाथ में लिए धारदार हथियार (फरसे) से सुनीता के सिर पर वार कर दिया। मां लहूलुहान होकर वहीं गिर पड़ी और आरोपी रूबी को जबरन उठाकर फरार हो गया।

अध्याय 2: गांव में मातम और सियासत की एंट्री

शाम होते-होते सुनीता ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। यह खबर जंगल की आग की तरह फैली। एक दलित महिला की हत्या और उसकी बेटी के अपहरण ने गांव को ‘बारूद के ढेर’ पर खड़ा कर दिया।

अगले दो दिन तक कपसाड़ गांव राजनीति का अखाड़ा बना रहा। सपा नेता अतुल प्रधान, चंद्रशेखर आज़ाद के समर्थक और कांग्रेस के नेता वहां पहुंचने लगे। पुलिस ने बैरिकेडिंग कर दी, मानो पूरा गांव एक छावनी हो। परिवार का एक ही ज़िद थी— “जब तक बेटी वापस नहीं आती, मां का अंतिम संस्कार नहीं होगा।”

अध्याय 3: 58 घंटे का ‘ऑपरेशन रूबी’

मेरठ पुलिस के लिए यह साख का सवाल बन चुका था। एसएसपी ने 10 टीमें बनाईं। सर्विलांस की मदद से पता चला कि आरोपी पारस लगातार अपनी लोकेशन बदल रहा था। वह दिल्ली गया, फिर हरियाणा की तरफ भागा। पुलिस की टीमें साये की तरह उसका पीछा कर रही थीं।

आखिरकार, शनिवार की शाम रुड़की रेलवे स्टेशन के पास घेराबंदी की गई। पुलिस ने देखा कि पारस वहां से कहीं और भागने की फिराक में था। करीब 58 घंटे बाद पारस पकड़ा गया और रूबी को सुरक्षित बचा लिया गया।

अध्याय 4: प्रेम और अपराध का उलझा हुआ धागा

पकड़े जाने के बाद कहानी में एक नया मोड़ आया। पूछताछ में पता चला कि पारस और रूबी के बीच पिछले 3 साल से प्रेम प्रसंग था। रूबी की शादी कहीं और तय हो गई थी, जिसे लेकर दोनों परेशान थे। पुलिस के मुताबिक, उन्होंने साथ भागने का मन बनाया था, लेकिन रास्ते में मां सुनीता के विरोध और फिर उनकी मौत ने इस प्रेम कहानी को एक खूनी जुर्म में बदल दिया।

अध्याय 5: इंसाफ की चौखट पर

आज कपसाड़ गांव में शांति तो है, लेकिन सन्नाटा भारी है। सुनीता के घर में मातम है, प्रशासन ने पीड़ित परिवार को 22 लाख रुपये की आर्थिक मदद और सुरक्षा का भरोसा दिया है। रूबी अब कोर्ट के सामने अपने बयान दर्ज कराएगी, जो यह तय करेंगे कि पारस का भविष्य जेल की सलाखों के पीछे कितना लंबा होगा।

उपसंहार: यह कहानी हमें याद दिलाती है कि आवेश में उठाया गया एक कदम न केवल दो परिवारों को तबाह कर देता है, बल्कि पूरे समाज में नफरत की खाई भी पैदा कर देता है।

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